Parātrīśikā· 1.21 / 36

Parātrīśikā1.21

1.21
अविधिज्ञो विधानज्ञो जायते यजनं प्रति । कालाग्निम् आदितः कृत्वा मायान्तम् ब्रह्मदेहगम् ॥२१॥
avidhijño vidhānajño jāyate yajanaṃ prati | kālāgnim āditaḥ kṛtvā māyāntam brahmadehagam
— विधि न जानने वाला — रीति से अनभिज्ञ ; — विधान का ज्ञाता — रीति का जानकार बन जाता है ; — हो जाता है ; — यजन — पूजा, यज्ञ ; — के विषय में, की ओर ; — कालाग्नि — काल की अग्नि (निम्नतम तत्त्व) ; — आरम्भ से, (नीचे से) आरम्भ करके ; — करके, (आरम्भ-बिन्दु) बनाकर ; — माया तक (माया-तत्त्व पर्यन्त) ; — ब्रह्म-देह में व्याप्त

विधि न जानने वाला भी यजन के विषय में विधि का ज्ञाता हो जाता है — कालाग्नि से आरम्भ करके, माया तक, ब्रह्म-देह में व्याप्त (तत्त्व-क्रम का चिन्तन करता हुआ)।