Parātrīśikā· 1.20 / 36

Parātrīśikā1.20

1.20
अनेन ज्ञातमात्रेण ज्ञायते सर्वशक्तिभिः । शाकिनीकुलसामान्यो भवेद् योगं विनापि हि ॥२०॥
anena jñātamātreṇa jñāyate sarvaśaktibhiḥ | śākinīkulasāmānyo bhaved yogaṃ vināpi hi
— इसके द्वारा ; — मात्र जान लेने से ; — जाना जाता है, पहचाना जाता है ; — समस्त शक्तियों द्वारा ; — शाकिनी-कुल का सामान्य — सजातीय, उस कुल का अंग ; — हो जाता है ; — योग — (औपचारिक) साधना ; — बिना भी (विना + अपि) ; — निश्चय ही, क्योंकि

इसके मात्र जान लेने से (साधक) समस्त शक्तियों द्वारा (अपना मान कर) जाना जाता है; योग के बिना भी वह शाकिनी-कुल का सामान्य (सजातीय) हो जाता है।