Parātrīśikā1.19
अदृष्टम.ङ्दलो ऽप्य् एवम् यः कश्चिद् वेत्ति तत्त्वतः ।
स सिद्धिभाग् भवेन् नित्यं स योगी स च दीक्षीतः ॥१९॥
adṛṣṭama.ṅdalo 'py evam yaḥ kaścid vetti tattvataḥ |
sa siddhibhāg bhaven nityaṃ sa yogī sa ca dīkṣītaḥ
— मण्डल को बिना देखे (दीक्षा-मण्डल से अनभिज्ञ) ; — भी (अपि) ; — इस प्रकार, ऐसे ; — जो कोई ; — कोई, कोई जन ; — जानता है ; — तत्त्वतः, यथार्थ रूप में ; — वह ; — सिद्धि का भागी — सिद्धि-सम्पन्न ; — हो जाए, हो ; — सदा, नित्य ; — वह ; — योगी ; — वह ; — और ; — दीक्षित — (वस्तुतः) संस्कारित, अभिषिक्त मण्डल को बिना देखे भी, जो कोई इस प्रकार इसे तत्त्वतः जान लेता है, वह सदा सिद्धि का भागी हो; वही योगी है और वही (वस्तुतः) दीक्षित है।