Parātrīśikā· 1.18 / 36

Parātrīśikā1.18

1.18
यत्किंचिद् भैरवे तन्त्रे सर्वम् अस्मात् प्रसिध्यति । मन्त्रवीर्यसमावेशप्रभावान् न नियन्त्रिणा ॥१८॥
yatkiṃcid bhairave tantre sarvam asmāt prasidhyati | mantravīryasamāveśaprabhāvān na niyantriṇā
— जो कुछ भी ; — भैरव (तन्त्र) में ; — तन्त्र में ; — सब, समस्त ; — इससे ; — सिद्ध होता है, सफल होता है ; — मन्त्र के वीर्य में आवेश (समावेश) के प्रभाव से ; — नहीं ; — किसी नियामक/नियन्त्रण से (बाह्य नियन्त्रक की आवश्यकता नहीं)

भैरव तन्त्र में जो कुछ भी है, वह सब इसी से सिद्ध होता है — मन्त्र के वीर्य में आवेश (समावेश) के प्रभाव से, न कि किसी नियामक (बाह्य नियन्त्रण) से।