Parātrīśikā· 1.14 / 36

Parātrīśikā1.14

1.14
सक्षात् पश्यत्य् असंदिग्धम् आकृष्टं रुद्रसक्तिभिः । प्रहरद्वयमात्रेण व्योमस्थो जायते स्मरन् ॥१४॥
sakṣāt paśyaty asaṃdigdham ākṛṣṭaṃ rudrasaktibhiḥ | praharadvayamātreṇa vyomastho jāyate smaran
— साक्षात्, प्रत्यक्ष नेत्रों से (यथा-प्रसारित) ; — देखता है ; — निःसंदेह, असंदिग्ध रूप से ; — आकृष्ट — पास खींचा हुआ ; — रुद्र-शक्तियों द्वारा ; — मात्र दो प्रहर में ; — व्योम (शून्याकाश) में स्थित ; — हो जाता है, उत्पन्न होता है ; — स्मरण करता हुआ, चिन्तन करता हुआ

रुद्र-शक्तियों द्वारा आकृष्ट (देवता) को वह निःसंदेह साक्षात् देखता है; मात्र दो प्रहर में, स्मरण करता हुआ, वह व्योम (शून्याकाश) में स्थित हो जाता है।