Parātrīśikā· 1.13 / 36

Parātrīśikā1.13

1.13
अतीतानागतानर्थान् पृष्टो ऽसौ कथयत्य् अपि । प्रहराद् यद् अभिप्रेतं देवतारूपम् उच्चरन् ॥१३॥
atītānāgatānarthān pṛṣṭo 'sau kathayaty api | praharād yad abhipretaṃ devatārūpam uccaran
— अतीत और अनागत के विषय (बीते और आने वाले) ; — पूछा गया, प्रश्न किया गया ; — वह, वह जन ; — कह देता है, बता देता है ; — भी ; — एक प्रहर के भीतर (दिन के चौथे भाग में) ; — जो भी ; — अभिप्रेत, अभीष्ट ; — देवता का रूप ; — उच्चारण करता हुआ, उच्चारता हुआ

पूछे जाने पर वह अतीत और अनागत के विषयों को भी कह देता है; देवता के रूप का उच्चारण करता हुआ, वह एक प्रहर के भीतर जो भी अभिप्रेत हो, (उसे प्रकट कर देता है)।