Parātrīśikā· 1.12 / 36

Parātrīśikā1.12

1.12
मुहूर्तं स्मरते यस् तु चुम्बके नाभिमुद्रितः । स बध्नाति तदा देहं मन्त्रमुद्रागणं नरः ॥१२॥
muhūrtaṃ smarate yas tu cumbake nābhimudritaḥ | sa badhnāti tadā dehaṃ mantramudrāgaṇaṃ naraḥ
— एक मुहूर्त के लिए ; — स्मरण करता है, चिन्तन करता है ; — जो (पुरुष) ; — किन्तु, ही ; — संगम-स्थल पर — मिलन-बिन्दु पर (चुम्बक) ; — नाभि पर मुद्रित (नाभि-मुद्रा से) ; — वह ; — बाँध लेता है ; — तब ; — देह को ; — मन्त्रों और मुद्राओं के समूह-रूप में ; — पुरुष, मनुष्य

जो पुरुष नाभि पर मुद्रित होकर, संगम-स्थल पर एक मुहूर्त के लिए भी इसका स्मरण करता है, वह तब अपने देह को मन्त्रों और मुद्राओं के समूह-रूप में बाँध लेता है।