Parātrīśikā· 1.11 / 36

Parātrīśikā1.11

1.11
अस्योच्चारे कृते सम्यङ् मन्त्रमुद्रागणो महान् । सद्यः सन्मुखताम् एति स्वदेहावेशलक्षणम् ॥११॥
asyoccāre kṛte samyaṅ mantramudrāgaṇo mahān | sadyaḥ sanmukhatām eti svadehāveśalakṣaṇam
— इसका उच्चार (इस बीज का उच्चारण) ; — किए जाने पर ; — भली प्रकार, सम्यक् ; — मन्त्रों और मुद्राओं का समूह ; — महान् ; — तत्काल, तुरन्त ; — सम्मुखता — सामने उपस्थित होने की अवस्था ; — आ जाता है, प्राप्त होता है ; — अपने ही देह में आवेश (प्रवेश) से लक्षित

इसका उच्चार जब भली प्रकार किया जाता है, तब मन्त्रों और मुद्राओं का महान् समूह तत्क्षण सम्मुख हो आता है, जिसका लक्षण अपने ही देह में आवेश (प्रवेश) है।