विशेषो ऽर्थावभासस्य सत्तायां न पुनः क्व चित्
विकल्पेषु भवेद् भाविभवद्भूतार्थगामिषु ॥२॥
viśeṣo 'rthāvabhāsasya sattāyāṃ na punaḥ kva cit
vikalpeṣu bhaved bhāvibhavadbhūtārthagāmiṣu
— विशेष, भेद; — अर्थ के आभास का; — सत्ता में (अस्तित्व में); — किन्तु नहीं; — कहीं भी; — विकल्पों में; — हो (विधि, √भू); — भविष्य, वर्तमान और भूत अर्थों पर विचरण करने वाले (में)
अर्थ के आभास में भेद हो सकता है, किन्तु उसकी सत्ता में कभी कहीं भेद नहीं होता — भविष्य, वर्तमान और भूत अर्थों पर विचरण करने वाले विकल्पों में भी (नहीं)।