तदैक्येन विना न स्यात् संविदां लोकपद्धतिः
प्रकाशैक्यात् तद् एकत्वं मातैकः स इति स्थितम् ॥१०॥
tadaikyena vinā na syāt saṃvidāṃ lokapaddhatiḥ
prakāśaikyāt tad ekatvaṃ mātaikaḥ sa iti sthitam
— उस (प्रमाता) की एकता के (बिना); — बिना; — नहीं हो सकती (विधि, √अस्); — संविदों (ज्ञानों) की; — लोक-पद्धति — लोक-व्यवहार का क्रम; — प्रकाश की एकता से; — वह, इसलिए; — एकत्व, एकता; — प्रमाता एक (है); — वह; — इति — इस प्रकार; — स्थित — स्थापित (भूत कृदन्त)
उस (प्रमाता) की एकता के बिना संविदों (ज्ञानों) में लोक-व्यवहार सम्भव नहीं होता; वह एकता प्रकाश की एकता से (सिद्ध होती है)। इस प्रकार यह स्थापित हुआ: प्रमाता एक है, वह (ईश्वर)।