Verses on the Recognition of the Lord· 8.10 / 11

Verses on the Recognition of the Lord8.10

8.10
तदैक्येन विना न स्यात् संविदां लोकपद्धतिः प्रकाशैक्यात् तद् एकत्वं मातैकः स इति स्थितम् ॥१०॥
tadaikyena vinā na syāt saṃvidāṃ lokapaddhatiḥ prakāśaikyāt tad ekatvaṃ mātaikaḥ sa iti sthitam
— उस (प्रमाता) की एकता के (बिना) ; — बिना ; — नहीं हो सकती (विधि, √अस्) ; — संविदों (ज्ञानों) की ; — लोक-पद्धति — लोक-व्यवहार का क्रम ; — प्रकाश की एकता से ; — वह, इसलिए ; — एकत्व, एकता ; — प्रमाता एक (है) ; — वह ; — इति — इस प्रकार ; — स्थित — स्थापित (भूत कृदन्त)

उस (प्रमाता) की एकता के बिना संविदों (ज्ञानों) में लोक-व्यवहार सम्भव नहीं होता; वह एकता प्रकाश की एकता से (सिद्ध होती है)। इस प्रकार यह स्थापित हुआ: प्रमाता एक है, वह (ईश्वर)।