Verses on the Recognition of the Lord· 8.11 / 11

Verses on the Recognition of the Lord8.11

8.11
स एव विमृशत्त्वेन नियतेन महेश्वरः विमर्श एव देवस्य शुद्धे ज्ञानक्रिये यतः ॥११॥
sa eva vimṛśattvena niyatena maheśvaraḥ vimarśa eva devasya śuddhe jñānakriye yataḥ
— वही ; — (अपने) विमर्शकत्व के कारण ; — नियत (अनिवार्य, स्वभावभूत) ; — महेश्वर (है) ; — विमर्श ही ; — देव का ; — शुद्ध (द्विवचन) ; — ज्ञान और क्रिया (हैं) ; — क्योंकि, चूँकि

वही, अपने नियत (अनिवार्य) विमर्शकत्व के कारण, महेश्वर है; क्योंकि देव का शुद्ध ज्ञान और क्रिया विमर्श ही है।