Verses on the Recognition of the Lord· 7.9 / 14

Verses on the Recognition of the Lord7.9

7.9
विविक्तं भूतलं शश्वद् भावानां स्वात्मनिष्ठितेः तत् कथं जातु तज्ज्ञानं भिन्नस्याभावसाधनम् ॥९॥
viviktaṃ bhūtalaṃ śaśvad bhāvānāṃ svātmaniṣṭhiteḥ tat kathaṃ jātu tajjñānaṃ bhinnasyābhāvasādhanam
— विविक्त, पृथक् ; — भूतल (खाली फर्श) ; — सदा, निरन्तर ; — भावों के ; — अपने ही स्वरूप में निष्ठ होने के कारण ; — इसलिए ; — कैसे? ; — कभी, बिल्कुल ; — उसका (भूतल का) ज्ञान ; — भिन्न (वस्तु) का ; — अभाव का साधन

भूतल सदा विविक्त (पृथक्) है, क्योंकि भाव अपने-अपने स्वरूप में ही निष्ठ रहते हैं; तो फिर उसका ज्ञान कैसे कभी किसी भिन्न (वस्तु जैसे घट) के अभाव का साधन हो सकता है?