viviktaṃ bhūtalaṃ śaśvad bhāvānāṃ svātmaniṣṭhiteḥ
tat kathaṃ jātu tajjñānaṃ bhinnasyābhāvasādhanam
— विविक्त, पृथक्; — भूतल (खाली फर्श); — सदा, निरन्तर; — भावों के; — अपने ही स्वरूप में निष्ठ होने के कारण; — इसलिए; — कैसे?; — कभी, बिल्कुल; — उसका (भूतल का) ज्ञान; — भिन्न (वस्तु) का; — अभाव का साधन
भूतल सदा विविक्त (पृथक्) है, क्योंकि भाव अपने-अपने स्वरूप में ही निष्ठ रहते हैं; तो फिर उसका ज्ञान कैसे कभी किसी भिन्न (वस्तु जैसे घट) के अभाव का साधन हो सकता है?