Verses on the Recognition of the Lord· 7.10 / 14

Verses on the Recognition of the Lord7.10

7.10
किम् त्व् आलोकचयो ऽन्धस्य स्पर्शो वोष्णादिको मृदुः तत्रास्ति साधयेत् तस्य स्वज्ञानम् अघटात्मताम् ॥१०॥
kim tv ālokacayo 'ndhasya sparśo voṣṇādiko mṛduḥ tatrāsti sādhayet tasya svajñānam aghaṭātmatām
— बल्कि, किन्तु ; — प्रकाश का समूह (दृष्टिवान् के लिए) ; — अन्धे के लिए ; — स्पर्श ; — अथवा ; — उष्ण आदि ; — मृदु, कोमल ; — वहाँ (भूतल पर) ; — है (√अस्) ; — सिद्ध करे (विधि, प्रेरणार्थक, √साध्) ; — उसका ; — उसका अपना ज्ञान ; — अघट-स्वरूपता को

बल्कि वहाँ (भूतल पर) प्रकाश का समूह (दृष्टिवान् के लिए), अथवा अन्धे के लिए उष्ण आदि अथवा मृदु स्पर्श विद्यमान है; और उसका अपना ज्ञान केवल उसके अघट-स्वरूप को ही सिद्ध करेगा।