पिशाचः स्याद् अनालोको ऽप्य् आलोकाभ्यन्तरे यथा
अदृश्यो भूतलस्यान्त न निषेध्यः स सर्वथा ॥११॥
piśācaḥ syād anāloko 'py ālokābhyantare yathā
adṛśyo bhūtalasyānta na niṣedhyaḥ sa sarvathā
— पिशाच (प्रेत); — हो (विधि, √अस्); — प्रकाश से अग्राह्य, अदृश्य; — भी; — प्रकाश के भीतर; — जैसे; — अदृश्य; — भूतल के; — भीतर; — नहीं; — निषेध्य — निषेध किया जाने वाला; — वह (पिशाच); — किसी भी प्रकार
जैसे कोई पिशाच प्रकाश के भीतर भी अप्रत्यक्ष रहकर विद्यमान रह सकता है, वैसे ही भूतल के भीतर (अदृश्य) वस्तु का किसी भी प्रकार (केवल भूतल-ज्ञान से) निषेध नहीं किया जा सकता।