Verses on the Recognition of the Lord· 7.11 / 14

Verses on the Recognition of the Lord7.11

7.11
पिशाचः स्याद् अनालोको ऽप्य् आलोकाभ्यन्तरे यथा अदृश्यो भूतलस्यान्त न निषेध्यः स सर्वथा ॥११॥
piśācaḥ syād anāloko 'py ālokābhyantare yathā adṛśyo bhūtalasyānta na niṣedhyaḥ sa sarvathā
— पिशाच (प्रेत) ; — हो (विधि, √अस्) ; — प्रकाश से अग्राह्य, अदृश्य ; — भी ; — प्रकाश के भीतर ; — जैसे ; — अदृश्य ; — भूतल के ; — भीतर ; — नहीं ; — निषेध्य — निषेध किया जाने वाला ; — वह (पिशाच) ; — किसी भी प्रकार

जैसे कोई पिशाच प्रकाश के भीतर भी अप्रत्यक्ष रहकर विद्यमान रह सकता है, वैसे ही भूतल के भीतर (अदृश्य) वस्तु का किसी भी प्रकार (केवल भूतल-ज्ञान से) निषेध नहीं किया जा सकता।