Verses on the Recognition of the Lord· 7.12 / 14

Verses on the Recognition of the Lord7.12

7.12
एवं रूप्यविदाभावरूपा शुक्तिमतिर् भवेत् न त्व् आद्यरजतज्ञप्तेः स्याद् अप्रामाण्यवेदिका ॥१२॥
evaṃ rūpyavidābhāvarūpā śuktimatir bhavet na tv ādyarajatajñapteḥ syād aprāmāṇyavedikā
— इसी प्रकार ; — रजत-ज्ञान के अभाव-रूप ; — शुक्ति का ज्ञान ; — हो (विधि, √भू) ; — किन्तु नहीं ; — मूल रजत-ज्ञान का ; — होगा (विधि, √अस्) ; — अप्रमाणता का बोधक

इसी प्रकार शुक्ति का ज्ञान रजत-ज्ञान के अभाव-रूप तो होगा; किन्तु वह मूल रजत-ज्ञान की अप्रमाणता का बोधक नहीं होगा।