Verses on the Recognition of the Lord· 7.13 / 14

Verses on the Recognition of the Lord7.13

7.13
धर्म्यसिद्धेर् अपि भवेद् बाधा नैवानुमानतः स्वसंवेदनसिद्धा तु युक्ता सैकप्रमातृजा ॥१३॥
dharmyasiddher api bhaved bādhā naivānumānataḥ svasaṃvedanasiddhā tu yuktā saikapramātṛjā
— धर्मी (आश्रय) के सिद्ध न होने के कारण ; — भी, इसके अतिरिक्त ; — हो (विधि, √भू) ; — बाधा, विरोध ; — बिल्कुल नहीं ; — अनुमान से ; — स्वसंवेदन से सिद्ध ; — किन्तु, बल्कि ; — युक्त, उचित (भूत कृदन्त) ; — वह (बाधा) ; — एक प्रमाता से उत्पन्न

इसके अतिरिक्त, धर्मी (आश्रय) के सिद्ध न होने के कारण, अनुमान से बाधा कभी उत्पन्न नहीं हो सकती; अपितु स्वसंवेदन से सिद्ध वह बाधा एक प्रमाता से उत्पन्न होने पर ही युक्त (उचित) है।