नैवं शुद्धस्थलज्ञानात् सिद्ध्येत् तस्याघटात्मना
न तूपलब्धियोग्यस्याप्य् अत्राभावो घटात्मनः ॥८॥
naivaṃ śuddhasthalajñānāt siddhyet tasyāghaṭātmanā
na tūpalabdhiyogyasyāpy atrābhāvo ghaṭātmanaḥ
— ऐसा नहीं; — शुद्ध (खाली) स्थल के ज्ञान से; — सिद्ध हो (विधि, √सिध्); — उस (भूतल) का; — अघट-स्वरूप रूप में; — किन्तु नहीं; — उपलब्धि-योग्य (वस्तु) के; — भी; — यहाँ; — अभाव; — घट-स्वरूप (वस्तु) का
(उत्तर:) ऐसा नहीं है। शुद्ध (खाली) स्थल के ज्ञान से तो केवल यही सिद्ध होगा कि उस (भूतल) का स्वरूप अघट है; किन्तु यहाँ उपलब्धि-योग्य घट-स्वरूप वस्तु के अभाव (का ज्ञान) नहीं होता।