Verses on the Recognition of the Lord5.7
चिदात्मैव हि देवो ऽन्तःस्थितम् इच्छावशाद् बहिः
योगीव निरुपादानम् अर्थजातं प्रकाशयेत् ॥७॥
cidātmaiva hi devo 'ntaḥsthitam icchāvaśād bahiḥ
yogīva nirupādānam arthajātaṃ prakāśayet
— चित्-स्वरूप ही, जिसका आत्मा चित् है ; — क्योंकि, निश्चय ही ; — देव — दिव्य आत्मा ; — भीतर स्थित (अर्थ को) ; — इच्छा के वश से ; — बाहर ; — योगी के समान ; — उपादान-कारण से रहित ; — अर्थ-समूह को ; — प्रकाशित करे (विधि, प्रेरणार्थक, √काश्+प्र) क्योंकि चित्-स्वरूप देव ही भीतर स्थित अर्थ-समूह को अपनी इच्छा के वश से बाहर प्रकाशित करता है — योगी के समान, बिना किसी उपादान-कारण के।