Verses on the Recognition of the Lord· 5.6 / 21

Verses on the Recognition of the Lord5.6

5.6
स्याद् एतद् अवभासेषु तेष्व् एवावसिते सति व्यवहारे किम् अन्येन बाह्येनानुपपत्तिना ॥६॥
syād etad avabhāseṣu teṣv evāvasite sati vyavahāre kim anyena bāhyenānupapattinā
— यह हो सकता है (विधि + यह) ; — आभासों में ; — उन्हीं (आभासों) में ; — (व्यवहार के) सम्पन्न होने पर ; — होने पर (√अस्, अधिकरण कृदन्त) ; — व्यवहार के (होने पर) ; — क्या (प्रयोजन)? ; — अन्य से ; — बाह्य (अर्थ) से ; — जो अनुपपन्न (असिद्ध) है

यह इतना कहा जा सकता है: चूँकि व्यवहार उन्हीं आभासों में सम्पन्न हो जाता है, तब किसी अन्य बाह्य अर्थ से — जो सिद्ध भी नहीं होता — क्या प्रयोजन?