Verses on the Recognition of the Lord· 5.3 / 21

Verses on the Recognition of the Lord5.3

5.3
भिन्ने प्रकाशे चाभिन्ने संकरो विषयस्य तत् प्रकाशात्मा प्रकाश्यो ऽर्थो नाप्रकाशश् च सिद्ध्यति ॥३॥
bhinne prakāśe cābhinne saṃkaro viṣayasya tat prakāśātmā prakāśyo 'rtho nāprakāśaś ca siddhyati
— (प्रकाश के अर्थ से) भिन्न होने पर ; — प्रकाश के (होने पर) ; — और ; — अथवा अभिन्न होने पर ; — संकर — मिश्रण, गड्डबड़ ; — विषय का ; — इसलिए ; — प्रकाश-स्वरूप, जिसका आत्मा प्रकाश है ; — प्रकाश्य — प्रकाशित किया जाने वाला ; — अर्थ ; — नहीं ; — अप्रकाश, प्रकाश-रहित ; — और ; — सिद्ध होता है (√सिध्)

प्रकाश को (अर्थ से) भिन्न मानें अथवा अभिन्न — दोनों ही दशाओं में विषय का संकर (मिश्रण) हो जाएगा; इसलिए प्रकाश्य अर्थ प्रकाश-स्वरूप ही है, और अप्रकाश अर्थ सिद्ध नहीं हो सकता।