तत्तदाकस्मिकाभासो बाह्यं चेद् अनुमापयेत्
न ह्य् अभिन्नस्य बोधस्य विचित्राभासहेतुता ॥४॥
tattadākasmikābhāso bāhyaṃ ced anumāpayet
na hy abhinnasya bodhasya vicitrābhāsahetutā
— उस-उस (वस्तु) का आकस्मिक आभास; — बाह्य (अर्थ); — यदि (कहा जाए); — अनुमान कराए (विधि, प्रेरणार्थक, √मा+अनु); — नहीं (ऐसा); — क्योंकि; — अभिन्न (एकरस) का; — बोध का; — विचित्र (नाना) आभासों का हेतु होना
यदि कहा जाए कि उस-उस वस्तु का आकस्मिक आभास बाह्य अर्थ का अनुमान कराता है — तो ऐसा नहीं है, क्योंकि अभिन्न (एकरस) बोध स्वयं विचित्र (नाना) आभासों का हेतु नहीं हो सकता।