Verses on the Recognition of the Lord· 5.4 / 21

Verses on the Recognition of the Lord5.4

5.4
तत्तदाकस्मिकाभासो बाह्यं चेद् अनुमापयेत् न ह्य् अभिन्नस्य बोधस्य विचित्राभासहेतुता ॥४॥
tattadākasmikābhāso bāhyaṃ ced anumāpayet na hy abhinnasya bodhasya vicitrābhāsahetutā
— उस-उस (वस्तु) का आकस्मिक आभास ; — बाह्य (अर्थ) ; — यदि (कहा जाए) ; — अनुमान कराए (विधि, प्रेरणार्थक, √मा+अनु) ; — नहीं (ऐसा) ; — क्योंकि ; — अभिन्न (एकरस) का ; — बोध का ; — विचित्र (नाना) आभासों का हेतु होना

यदि कहा जाए कि उस-उस वस्तु का आकस्मिक आभास बाह्य अर्थ का अनुमान कराता है — तो ऐसा नहीं है, क्योंकि अभिन्न (एकरस) बोध स्वयं विचित्र (नाना) आभासों का हेतु नहीं हो सकता।