Verses on the Recognition of the Lord· 5.2 / 21

Verses on the Recognition of the Lord5.2

5.2
प्रागिवार्थो ऽप्रकाशः स्यात् प्रकाशात्मतया विना न च प्रकाशो भिन्नः स्याद् आत्मार्थस्य प्रकाशता ॥२॥
prāgivārtho 'prakāśaḥ syāt prakāśātmatayā vinā na ca prakāśo bhinnaḥ syād ātmārthasya prakāśatā
— पहले के समान (अर्थात् केवल भीतर रहते हुए) ; — अर्थ ; — अप्रकाश, प्रकाश-रहित ; — होगा (विधि, √अस्) ; — प्रकाश-स्वरूपता के द्वारा (के बिना) ; — बिना ; — और नहीं ; — प्रकाश (चैतन्य का) ; — भिन्न, पृथक् ; — होगा (विधि, √अस्) ; — अर्थ के आत्मा (स्वरूप) की ; — (जो) प्रकाशता (है)

प्रकाश-स्वरूपता के बिना अर्थ पूर्ववत् (आभीतरिक स्थिति के समान) अप्रकाश ही रहेगा; और प्रकाश (अर्थ से) भिन्न नहीं हो सकता, क्योंकि अर्थ की प्रकाशता उसका अपना ही आत्मा है।