प्रागिवार्थो ऽप्रकाशः स्यात् प्रकाशात्मतया विना
न च प्रकाशो भिन्नः स्याद् आत्मार्थस्य प्रकाशता ॥२॥
prāgivārtho 'prakāśaḥ syāt prakāśātmatayā vinā
na ca prakāśo bhinnaḥ syād ātmārthasya prakāśatā
— पहले के समान (अर्थात् केवल भीतर रहते हुए); — अर्थ; — अप्रकाश, प्रकाश-रहित; — होगा (विधि, √अस्); — प्रकाश-स्वरूपता के द्वारा (के बिना); — बिना; — और नहीं; — प्रकाश (चैतन्य का); — भिन्न, पृथक्; — होगा (विधि, √अस्); — अर्थ के आत्मा (स्वरूप) की; — (जो) प्रकाशता (है)
प्रकाश-स्वरूपता के बिना अर्थ पूर्ववत् (आभीतरिक स्थिति के समान) अप्रकाश ही रहेगा; और प्रकाश (अर्थ से) भिन्न नहीं हो सकता, क्योंकि अर्थ की प्रकाशता उसका अपना ही आत्मा है।