vartamānāvabhāsānāṃ bhāvānām avabhāsanam
antaḥsthitavatām eva ghaṭate bahir ātmanā
— जिनका प्रतिभास वर्तमान है (ऐसे भावों) का; — भावों का, पदार्थों का; — अवभासन — प्रकाशन, प्रकट होना; — (पहले से) भीतर स्थित (भावों) का; — ही, केवल; — घटता है, सम्भव होता है (√घट्, आत्मनेपद); — बाहर, बाह्य रूप से; — (अपने ही) स्वरूप से
जिन भावों (पदार्थों) का प्रतिभास वर्तमान है, उनका बाह्य रूप से प्रकाशन उन्हीं के लिए सम्भव है जो (पहले से) भीतर (संवित् में) स्थित हैं, और जो अपने ही स्वरूप से बाहर प्रकट होते हैं।