Verses on the Recognition of the Lord· 5.17 / 21

Verses on the Recognition of the Lord5.17

5.17
नाहन्तादिपरामर्शभेदाद् अस्यानयतात्मनः अहंमृश्यतयाइवास्य सृष्तेस् तिङ्वाच्यकर्मवत् ॥१७॥
nāhantādiparāmarśabhedād asyānayatātmanaḥ ahaṃmṛśyatayāivāsya sṛṣtes tiṅvācyakarmavat
— नहीं (खण्डन होता) ; — 'अहन्ता' आदि के परामर्श के भेद से ; — इसका, उसका ; — जिसका स्वरूप (इससे) दूर नहीं ले जाया जाता ; — 'अहम्'-मृश्य रूप में ही ('मैं' के रूप में विमर्श का विषय) ; — इसकी, उसकी ; — सृष्टि (की) ; — तिङन्त (क्रिया-पद) में वाच्य कर्म के समान

'अहन्ता' आदि के परामर्श के भेद से (उसका स्वातन्त्र्य खण्डित) नहीं होता, क्योंकि उसका स्वरूप (इससे) अपने से दूर नहीं ले जाया जाता; उसकी सृष्टि 'अहम्' के रूप में ही मृश्य (विमर्श का विषय) है — जैसे तिङन्त (क्रिया-पद) में वाच्य कर्म।