Verses on the Recognition of the Lord· 5.16 / 21

Verses on the Recognition of the Lord5.16

5.16
स्वातन्त्र्यामुक्तात्मानं स्वातन्त्र्याद् अद्वयात्मनः प्रभुर् ईशादिसंकल्पैर् निर्माय व्यवहारयेत् ॥१६॥
svātantryāmuktātmānaṃ svātantryād advayātmanaḥ prabhur īśādisaṃkalpair nirmāya vyavahārayet
— स्वातन्त्र्य से (विमुक्त प्रतीत होने वाले) आत्माओं को ; — (अपने ही) स्वातन्त्र्य से ; — अद्वय-स्वरूप (का) ; — प्रभु — स्वामी ; — 'ईश' आदि संकल्पों के द्वारा (सीमित प्रमाता) ; — निर्माण करके (पूर्वकालिक क्रिया, √मा+निर्) ; — व्यवहार में प्रवृत्त करे (विधि, प्रेरणार्थक, √हृ+वि-अव)

अपने स्वातन्त्र्य से ही अद्वय-स्वरूप वह प्रभु 'ईश' आदि संकल्पों के द्वारा स्वातन्त्र्य से रहित प्रतीत होने वाले आत्माओं को रचकर उन्हें व्यवहार में प्रवृत्त करता है।