Verses on the Recognition of the Lord· 5.15 / 21

Verses on the Recognition of the Lord5.15

5.15
आत्मानम् अत एवायं ज्ञेयीकुर्यात् पृथक्स्थिति ज्ञेयं न तु तदौन्मुख्यात् खण्ड्येतास्य स्वतन्त्रता ॥१५॥
ātmānam ata evāyaṃ jñeyīkuryāt pṛthaksthiti jñeyaṃ na tu tadaunmukhyāt khaṇḍyetāsya svatantratā
— अपने को, आत्मा को ; — इसी कारण ; — यह (ईश्वर) ; — ज्ञेय बना सकता है (विधि, च्वि+√कृ) ; — पृथक् स्थित ; — ज्ञेय (वस्तु) ; — किन्तु नहीं ; — उस (आत्म-ज्ञेयीकरण) की ओर उन्मुख होने से ; — खण्डित हो (विधि, कर्मवाच्य, √खण्ड्) ; — इसका ; — स्वतन्त्रता

इसी कारण वह (ईश्वर) अपने को ज्ञेय बना सकता है — किन्तु पृथक् स्थित ज्ञेय नहीं; क्योंकि इस (आत्म-)ज्ञेयीकरण की ओर उन्मुख होने से उसका स्वातन्त्र्य खण्डित नहीं होता।