Verses on the Recognition of the Lord· 5.14 / 21

Verses on the Recognition of the Lord5.14

5.14
सा स्फुरत्ता महासत्ता देशकालाविशेषिनी सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥१४॥
sā sphurattā mahāsattā deśakālāviśeṣinī saiṣā sāratayā proktā hṛdayaṃ parameṣṭhinaḥ
— वह (चिति) ; — स्फुरत्ता — स्फुरण, स्पंदमान दीप्ति ; — महासत्ता — परम सत्ता ; — देश-काल से अनवच्छिन्न (अमर्यादित) ; — यही (चिति) ; — सार रूप में ; — प्रोक्ता — कही गई (भूत कृदन्त) ; — हृदय ; — परमेष्ठी (परम शिव) का

वही स्फुरत्ता (स्फुरण) है, महासत्ता है, देश और काल से अनवच्छिन्न है; यही (चिति) सार रूप में परमेष्ठी (परम शिव) का हृदय कही गई है।