Verses on the Recognition of the Lord· 5.13 / 21

Verses on the Recognition of the Lord5.13

5.13
चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परा वाक् स्वरसोदिता स्वातन्त्र्यम् एतन् मुख्यं तद् ऐश्वर्यं परमात्मनः ॥१३॥
citiḥ pratyavamarśātmā parā vāk svarasoditā svātantryam etan mukhyaṃ tad aiśvaryaṃ paramātmanaḥ
— चिति — गतिशील चैतन्य-शक्ति ; — प्रत्यवमर्श-स्वरूप, जिसका सार विमर्श है ; — परा वाक् — सर्वोच्च वाणी ; — अपने ही रस से स्वयं उदित ; — स्वातन्त्र्य — स्वतन्त्रता ; — यह ; — मुख्य, प्रधान ; — वह ; — ऐश्वर्य — प्रभुत्व ; — परमात्मा का

चिति, जिसका सार प्रत्यवमर्श (विमर्श) है, परा वाक् है, जो अपने ही रस से स्वयं उदित होती है; यही उसका मुख्य स्वातन्त्र्य है, वही परमात्मा का ऐश्वर्य है।