Verses on the Recognition of the Lord5.13
चितिः प्रत्यवमर्शात्मा परा वाक् स्वरसोदिता
स्वातन्त्र्यम् एतन् मुख्यं तद् ऐश्वर्यं परमात्मनः ॥१३॥
citiḥ pratyavamarśātmā parā vāk svarasoditā
svātantryam etan mukhyaṃ tad aiśvaryaṃ paramātmanaḥ
— चिति — गतिशील चैतन्य-शक्ति ; — प्रत्यवमर्श-स्वरूप, जिसका सार विमर्श है ; — परा वाक् — सर्वोच्च वाणी ; — अपने ही रस से स्वयं उदित ; — स्वातन्त्र्य — स्वतन्त्रता ; — यह ; — मुख्य, प्रधान ; — वह ; — ऐश्वर्य — प्रभुत्व ; — परमात्मा का चिति, जिसका सार प्रत्यवमर्श (विमर्श) है, परा वाक् है, जो अपने ही रस से स्वयं उदित होती है; यही उसका मुख्य स्वातन्त्र्य है, वही परमात्मा का ऐश्वर्य है।