Verses on the Recognition of the Lord· 5.12 / 21

Verses on the Recognition of the Lord5.12

5.12
आत्मात एव चैतन्यं चित्क्रिया चितिकर्तृता तात्पर्येणोदितस् तेन जडात् स हि विलक्षणः ॥१२॥
ātmāta eva caitanyaṃ citkriyā citikartṛtā tātparyeṇoditas tena jaḍāt sa hi vilakṣaṇaḥ
— आत्मा ; — इसी कारण ; — चैतन्य (कहा जाता है) ; — चित्-क्रिया — चेतन होने की क्रिया ; — चिति-कर्तृता — चेतन-कर्ता-भाव ; — तात्पर्य की दृष्टि से ; — उदित — कहा गया, अभिहित (भूत कृदन्त) ; — उससे, इसलिए ; — जड़ से ; — वह (आत्मा) ; — निश्चय ही ; — विलक्षण — अत्यन्त भिन्न

इसी कारण आत्मा को 'चैतन्य', चित्-क्रिया तथा चिति-कर्तृता कहा गया है — तात्पर्य की दृष्टि से; और इसी से वह जड़ से अत्यन्त विलक्षण है।