Verses on the Recognition of the Lord· 5.10 / 21

Verses on the Recognition of the Lord5.10

5.10
स्वामिनश् चात्मसंस्थस्य भावजातस्य भासनम् अस्त्य् एव न विना तस्माद् इच्छामर्शः प्रवर्तते ॥१०॥
svāminaś cātmasaṃsthasya bhāvajātasya bhāsanam asty eva na vinā tasmād icchāmarśaḥ pravartate
— स्वामी (ईश्वर) के लिए ; — और ; — अपने में स्थित ; — भाव-समूह का ; — भासन — प्रकाशन ; — है ही (√अस्) ; — नहीं ; — उस (प्रकाशन) के बिना ; — उससे, इसलिए ; — इच्छा का विमर्श ('मैं ऐसा करूँ') ; — प्रवृत्त होता है (√वृत्+प्र, आत्मनेपद)

और स्वामी (ईश्वर) के लिए अपने में स्थित भाव-समूह का प्रकाशन है ही; क्योंकि उसके बिना इच्छा का विमर्श ('मैं ऐसा करूँ') प्रवृत्त नहीं हो सकता।