Verses on the Recognition of the Lord· 3.5 / 7

Verses on the Recognition of the Lord3.5

3.5
भ्रान्तित्वे चावसायस्य न जडाद् विषयस्थितिः ततो ऽजाड्ये निजोल्लेखनिष्ठान् नार्थस्थितिस् ततः ॥५॥
bhrāntitve cāvasāyasya na jaḍād viṣayasthitiḥ tato 'jāḍye nijollekhaniṣṭhān nārthasthitis tataḥ
— (अवसाय के) भ्रान्ति-रूप होने पर ; — और ; — अवसाय (निश्चय) का ; — नहीं ; — जड़ से ; — विषय की स्थिति ; — उससे, इसलिए ; — अजड़ता (चैतन्य) होने पर ; — अपने ही उल्लेख में निष्ठ होने के कारण ; — नहीं ; — (बाह्य) अर्थ की स्थिति ; — उससे

और यदि अवसाय (निश्चय) भ्रान्ति-रूप हो, तो जड़ से विषय की स्थिति नहीं हो सकती; और यदि अजड़ता (चैतन्य) हो, तो वह अपने ही उल्लेख में निष्ठ होने के कारण उससे (बाह्य) अर्थ की स्थिति भी नहीं होती।