bhrāntitve cāvasāyasya na jaḍād viṣayasthitiḥ
tato 'jāḍye nijollekhaniṣṭhān nārthasthitis tataḥ
— (अवसाय के) भ्रान्ति-रूप होने पर; — और; — अवसाय (निश्चय) का; — नहीं; — जड़ से; — विषय की स्थिति; — उससे, इसलिए; — अजड़ता (चैतन्य) होने पर; — अपने ही उल्लेख में निष्ठ होने के कारण; — नहीं; — (बाह्य) अर्थ की स्थिति; — उससे
और यदि अवसाय (निश्चय) भ्रान्ति-रूप हो, तो जड़ से विषय की स्थिति नहीं हो सकती; और यदि अजड़ता (चैतन्य) हो, तो वह अपने ही उल्लेख में निष्ठ होने के कारण उससे (बाह्य) अर्थ की स्थिति भी नहीं होती।