स्मृतितैव कथं तावद् भ्रान्तेश् चार्थस्थितिः कथम्
पूर्वानुभवसंकारापेक्षा च किम् इतीष्यते ॥४॥
smṛtitaiva kathaṃ tāvad bhrānteś cārthasthitiḥ katham
pūrvānubhavasaṃkārā-pekṣā ca kim itīṣyate
— स्मृति-भाव ही, स्मृति होना ही; — कैसे (सम्भव हो)?; — सर्वप्रथम; — भ्रान्ति के (होने पर); — और; — अर्थ की स्थिति (निश्चय); — कैसे?; — पूर्व अनुभव के संस्कार की अपेक्षा; — और; — क्यों (स्वीकार की जाती है)?; — इति — इस प्रकार; — इष्यते — स्वीकार की जाती है (कर्मवाच्य, √इष्)
क्योंकि सर्वप्रथम तो वह स्मृति ही कैसे (कहलाएगी)? और भ्रान्ति में अर्थ की स्थिति (निश्चय) कैसे हो? और पूर्व अनुभव के संस्कार की अपेक्षा क्यों स्वीकार की जाती है (यदि स्मृति उस अनुभव तक नहीं पहुँचती)?