Verses on the Recognition of the Lord· 2.9 / 11

Verses on the Recognition of the Lord2.9

2.9
क्रियाप्य् अर्थस्य कायादेस् तत्तद्देशादिजातता नान्यादृष्टेर् न साप्य् एका क्रमिकैकस्य चोचिता ॥९॥
kriyāpy arthasya kāyādes tattaddeśādijātatā nānyādṛṣṭer na sāpy ekā kramikaikasya cocitā
— क्रिया ; — भी ; — अर्थ की ; — शरीर आदि की ; — उस-उस देश आदि में उत्पन्न होना ; — नहीं ; — अन्य (इस उत्पत्ति से) ; — (क्योंकि अन्य) देखा नहीं जाता ; — नहीं, न ही ; — वह (क्रिया) ; — भी ; — एक (अविभाज्य) ; — क्रमिक, क्रमयुक्त ; — एक (अर्थ) के लिए ; — और ; — उचित, समुचित

अर्थ की — जैसे शरीर आदि की — क्रिया भी उसका उस-उस देश आदि में उत्पन्न होना मात्र है; क्योंकि इससे अन्य कुछ देखा नहीं जाता। और वह क्रिया एक भी नहीं है, क्योंकि क्रमिक (प्रक्रिया) एक ही (अर्थ) के लिए उचित नहीं है।