Verses on the Recognition of the Lord· 2.8 / 11

Verses on the Recognition of the Lord2.8

2.8
अथार्थस्य यथा रूपं धत्ते बुद्धिस् तथात्मनः चैतन्यम् अजडा सैवं जाड्ये नार्थप्रकासता ॥८॥
athārthasya yathā rūpaṃ dhatte buddhis tathātmanaḥ caitanyam ajaḍā saivaṃ jāḍye nārthaprakāsatā
— अब (आगे) ; — अर्थ का ; — जैसे ; — रूप, आकार ; — धारण करती है (√धा, आत्मनेपद) ; — बुद्धि, ज्ञान ; — वैसे ही ; — आत्मा का ; — चैतन्य (का रूप) ; — अजड़ होती हुई ; — वह (बुद्धि) ; — इस प्रकार ; — जड़ता होने पर ; — नहीं, नहीं हो सकता ; — अर्थ-प्रकाशता — अर्थों का प्रकाशन

अब, जैसे बुद्धि अर्थ के रूप को धारण करती है, वैसे ही वह आत्मा के चैतन्य को भी धारण करती है; इस प्रकार अजड़ होकर ही वह (अर्थ को प्रकाशित करती है); जड़ता होने पर अर्थ का प्रकाशन नहीं हो सकता।