Verses on the Recognition of the Lord· 2.7 / 11

Verses on the Recognition of the Lord2.7

2.7
ज्ञानं च चित्स्वरूपं चेत् तद् अनित्यं किम् आत्मवत् अथापि जडम् एतस्य कथम् अर्थप्रकाशता ॥७॥
jñānaṃ ca citsvarūpaṃ cet tad anityaṃ kim ātmavat athāpi jaḍam etasya katham arthaprakāśatā
— ज्ञान ; — और, इसके अतिरिक्त ; — चित्-स्वरूप, जिसका स्वरूप चैतन्य है ; — यदि ; — वह (ज्ञान) ; — अनित्य ; — कैसे, क्यों (अनित्य)? ; — आत्मा के समान ; — किन्तु यदि (दूसरी ओर) ; — जड़ ; — इस (ज्ञान) का ; — कैसे? ; — अर्थ-प्रकाशता — अर्थों का प्रकाशन

(उत्तर का आरम्भ:) और यदि ज्ञान चित्-स्वरूप है, तो वह आत्मा के समान अनित्य क्यों हो? और यदि (दूसरी ओर) वह जड़ है, तो इसके द्वारा अर्थ का प्रकाशन कैसे हो सकता है?