jñānaṃ ca citsvarūpaṃ cet tad anityaṃ kim ātmavat
athāpi jaḍam etasya katham arthaprakāśatā
— ज्ञान; — और, इसके अतिरिक्त; — चित्-स्वरूप, जिसका स्वरूप चैतन्य है; — यदि; — वह (ज्ञान); — अनित्य; — कैसे, क्यों (अनित्य)?; — आत्मा के समान; — किन्तु यदि (दूसरी ओर); — जड़; — इस (ज्ञान) का; — कैसे?; — अर्थ-प्रकाशता — अर्थों का प्रकाशन
(उत्तर का आरम्भ:) और यदि ज्ञान चित्-स्वरूप है, तो वह आत्मा के समान अनित्य क्यों हो? और यदि (दूसरी ओर) वह जड़ है, तो इसके द्वारा अर्थ का प्रकाशन कैसे हो सकता है?