Verses on the Recognition of the Lord· 2.6 / 11

Verses on the Recognition of the Lord2.6

2.6
ततो भिन्नेषु धर्मेषु तत्स्वरूपाविशेषतह् संस्कारात् स्मृइतिसिद्धौ स्यात् स्मर्ता द्रष्टेव कल्पितः ॥६॥
tato bhinneṣu dharmeṣu tatsvarūpāviśeṣatah saṃskārāt smṛitisiddhau syāt smartā draṣṭeva kalpitaḥ
— इसलिए, अतः ; — भिन्न (क्षणिक) में ; — धर्मों में (चित्त-वृत्तियों में) ; — उनके स्वरूप की अभिन्नता (समानता) के कारण ; — संस्कार से ; — स्मृति की सिद्धि होने पर ; — होगा (विधि, √अस्) ; — स्मर्ता — स्मरण करने वाला ; — द्रष्टा के समान (अर्थात् केवल कल्पित) ; — कल्पित, कल्पना से रचा हुआ

(विरोधी:) इसलिए, भिन्न-भिन्न क्षणिक धर्मों (चित्त-वृत्तियों) में, उनके स्वरूप की समानता के कारण, जब संस्कार से स्मृति सिद्ध होती है, तब 'स्मर्ता' भी 'द्रष्टा' के समान केवल कल्पित (मानी गई वस्तु) ही है।