यतो हि पूर्वानुभवसंस्कारात् स्मृतिसंभवः
यद्य् एवम् अन्तर्गडुना को ऽर्थः स्यात् स्थायिनात्मना ॥५॥
yato hi pūrvānubhavasaṃskārāt smṛtisaṃbhavaḥ
yady evam antargaḍunā ko 'rthaḥ syāt sthāyinātmanā
— क्योंकि, चूँकि; — क्योंकि, निश्चय ही; — पूर्व अनुभव के संस्कार से; — स्मृति की उत्पत्ति; — यदि; — ऐसा, इस प्रकार; — आन्तरिक गाँठ (अनावश्यक बोझ) समान से; — क्या?; — प्रयोजन, लाभ; — हो (विधि, √अस्) — क्या प्रयोजन हो; — स्थायी (नित्य) से; — आत्मा से
(विरोधी का निष्कर्ष:) क्योंकि पूर्व अनुभव के संस्कार से ही स्मृति उत्पन्न होती है, तो ऐसा होने पर इस आन्तरिक गाँठ-समान स्थायी आत्मा से क्या प्रयोजन?