Verses on the Recognition of the Lord· 15.9 / 18

Verses on the Recognition of the Lord15.9

15.9
तस्यासाधारणी सृष्टिर् ईशसृष्ट्युपजीविनी सैषाप्य् अज्ञतया सत्यैवेशशाक्त्या तदात्मनः ॥९॥
tasyāsādhāraṇī sṛṣṭir īśasṛṣṭyupajīvinī saiṣāpy ajñatayā satyai-veśaśāktyā tadātmanaḥ
— उस (जीव) की ; — असाधारण, निजी (अ-साझी) ; — सृष्टि ; — ईश की सृष्टि पर जीवित रहने वाली (आश्रित) ; — यही (निजी सृष्टि) ; — भी ; — (उसकी) अज्ञता से ; — सत्य ही (है) ; — ईश की शक्ति से ; — उसका (जीव का) आत्मा जो वह (ईश्वर) है

उस (जीव) की असाधारण (निजी) सृष्टि ईश्वर की सृष्टि पर ही जीवित रहती है (आश्रित है); और यह (निजी सृष्टि) भी, यद्यपि (उसकी) अज्ञता से (उत्पन्न होती है), तथापि ईश की शक्ति से सत्य ही है, क्योंकि उसका आत्मा वही (ईश्वर) है।