ते तु भिन्नावभासार्थाः प्रकल्प्याः प्रत्यगात्मनः
तत्तद्विभिन्नसंज्ञाभिः स्मृत्युत्प्रेक्षादिगोचरे ॥८॥
te tu bhinnāvabhāsārthāḥ prakalpyāḥ pratyagātmanaḥ
tattadvibhinnasaṃjñābhiḥ smṛtyutprekṣādigocare
— वे (वे भाव); — किन्तु; — भिन्न-आभास वाले अर्थ; — कल्पित किए जाने योग्य (विधिवत् कृदन्त); — प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा, सीमित प्रमाता) के द्वारा; — उस-उस भिन्न संज्ञा (नाम) से; — स्मृति, उत्प्रेक्षा (कल्पना) आदि के क्षेत्र में
किन्तु वे भिन्न-आभास वाले अर्थ प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा, सीमित प्रमाता) के द्वारा उस-उस भिन्न संज्ञा (नाम) से, स्मृति, उत्प्रेक्षा (कल्पना) आदि के क्षेत्र में, कल्पित किए जाते हैं।