Verses on the Recognition of the Lord· 15.8 / 18

Verses on the Recognition of the Lord15.8

15.8
ते तु भिन्नावभासार्थाः प्रकल्प्याः प्रत्यगात्मनः तत्तद्विभिन्नसंज्ञाभिः स्मृत्युत्प्रेक्षादिगोचरे ॥८॥
te tu bhinnāvabhāsārthāḥ prakalpyāḥ pratyagātmanaḥ tattadvibhinnasaṃjñābhiḥ smṛtyutprekṣādigocare
— वे (वे भाव) ; — किन्तु ; — भिन्न-आभास वाले अर्थ ; — कल्पित किए जाने योग्य (विधिवत् कृदन्त) ; — प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा, सीमित प्रमाता) के द्वारा ; — उस-उस भिन्न संज्ञा (नाम) से ; — स्मृति, उत्प्रेक्षा (कल्पना) आदि के क्षेत्र में

किन्तु वे भिन्न-आभास वाले अर्थ प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा, सीमित प्रमाता) के द्वारा उस-उस भिन्न संज्ञा (नाम) से, स्मृति, उत्प्रेक्षा (कल्पना) आदि के क्षेत्र में, कल्पित किए जाते हैं।