— भेद में स्थित होने की दृष्टि से; — शक्तिमान् (ईश्वर) की; — शक्ति होने का स्वरूप (शक्तित्व); — नहीं दिया जाता, अभिहित नहीं होता (कर्मवाच्य, √दिश्+अप); — इन; — गुणों (सत्त्व, रजस्, तमस्) का; — जो करण और कार्य रूप में परिणत होते हैं
भेद में स्थित होने की दृष्टि से, शक्तिमान् (ईश्वर) की शक्ति होने का स्वरूप इन गुणों को नहीं दिया जाता, जो (केवल) करण और कार्य रूप में परिणत होते हैं।