Verses on the Recognition of the Lord· 15.4 / 18

Verses on the Recognition of the Lord15.4

15.4
स्वाङ्गरूपेषु भावेषु पत्युर् ज्ञानं क्रिया च या मायातृतीये ते एव पशोः सत्त्वं रजस् तमः ॥४॥
svāṅgarūpeṣu bhāveṣu patyur jñānaṃ kriyā ca yā māyātṛtīye te eva paśoḥ sattvaṃ rajas tamaḥ
— अपने अंगों के रूप में (प्रतीत होते भावों में) ; — भावों में ; — पति (ईश्वर) का ; — ज्ञान ; — और क्रिया ; — और ; — जो ; — माया के तृतीय रूप में जुड़ने पर (माया से आच्छादित होने पर) (द्विवचन) ; — वही दोनों (द्विवचन) ; — पशु (बद्ध जीव) के ; — सत्त्व, रजस् और तमस् (बन जाते हैं)

अपने अंगों के रूप में प्रतीत होने वाले भावों में जो पति (ईश्वर) का ज्ञान और क्रिया है — वही दोनों, माया के तृतीय रूप में जुड़ने पर (आच्छादित होने पर), पशु (बद्ध जीव) के लिए सत्त्व, रजस् और तमस् बन जाते हैं।