स्वाङ्गरूपेषु भावेषु पत्युर् ज्ञानं क्रिया च या
मायातृतीये ते एव पशोः सत्त्वं रजस् तमः ॥४॥
svāṅgarūpeṣu bhāveṣu patyur jñānaṃ kriyā ca yā
māyātṛtīye te eva paśoḥ sattvaṃ rajas tamaḥ
— अपने अंगों के रूप में (प्रतीत होते भावों में); — भावों में; — पति (ईश्वर) का; — ज्ञान; — और क्रिया; — और; — जो; — माया के तृतीय रूप में जुड़ने पर (माया से आच्छादित होने पर) (द्विवचन); — वही दोनों (द्विवचन); — पशु (बद्ध जीव) के; — सत्त्व, रजस् और तमस् (बन जाते हैं)
अपने अंगों के रूप में प्रतीत होने वाले भावों में जो पति (ईश्वर) का ज्ञान और क्रिया है — वही दोनों, माया के तृतीय रूप में जुड़ने पर (आच्छादित होने पर), पशु (बद्ध जीव) के लिए सत्त्व, रजस् और तमस् बन जाते हैं।