Verses on the Recognition of the Lord· 15.3 / 18

Verses on the Recognition of the Lord15.3

15.3
स्वस्वरूपापरिज्ञानमयो ऽनेकः पुमान् मतः तत्र सृष्टौ क्रियानन्दौ भोगो दुःखसुखात्मकः ॥३॥
svasvarūpāparijñānamayo 'nekaḥ pumān mataḥ tatra sṛṣṭau kriyānandau bhogo duḥkhasukhātmakaḥ
— अपने स्वरूप के अपरिज्ञान से युक्त ; — अनेक ; — पुमान् — पुरुष (जीव) ; — माना जाता है (भूत कृदन्त) ; — वहाँ, उसके लिए ; — सृष्टि (क्रिया) में ; — क्रिया और आनन्द (द्विवचन) ; — भोग — अनुभव, सांसारिक भोग ; — दुःख और सुख स्वरूप

अपने स्वरूप के अपरिज्ञान से युक्त पुरुष (जीव) अनेक माना जाता है; उसके लिए, सृष्टि (क्रिया) में, क्रिया और आनन्द हैं — (उसका) भोग, जो दुःख और सुख स्वरूप है।