Verses on the Recognition of the Lord· 15.2 / 18

Verses on the Recognition of the Lord15.2

15.2
तत्र स्वसृष्टेदंभागे बुद्ध्यादिग्राहकात्मना अहंकारपरामर्शपदम् नीतम् अनेन तत् ॥२॥
tatra svasṛṣṭedaṃbhāge buddhyādigrāhakātmanā ahaṃkāraparāmarśapadam nītam anena tat
— वहाँ, उसमें ; — अपनी रची हुई 'इदम्' (यह) भाग में ; — बुद्धि आदि ग्राहक (प्रमाता) रूप से ; — अहंकार के परामर्श के पद को ; — ले जाया गया (भूत कृदन्त) ; — इसके (ईश्वर के) द्वारा ; — वह (भाग)

उसमें, अपनी रची हुई 'इदम्' (यह) भाग में, उस (ईश्वर) के द्वारा वह (भाग) — बुद्धि आदि ग्राहक (प्रमाता) रूप से — अहंकार के परामर्श के पद तक ले जाया जाता है।