Verses on the Recognition of the Lord· 15.1 / 18

Verses on the Recognition of the Lord15.1

15.1
स्वात्मैव सर्वजन्तूनाम् एक एव महेश्वरः विश्वरूपो ऽहम् इदम् इत्य् अखण्डामर्शबृंहितः ॥१॥
svātmaiva sarvajantūnām eka eva maheśvaraḥ viśvarūpo 'ham idam ity akhaṇḍāmarśabṛṃhitaḥ
— अपना आत्मा ही, स्वात्मा ही ; — समस्त प्राणियों का ; — एकमात्र, एक ही ; — महेश्वर ; — विश्व-रूप, जिसका रूप विश्व है ; — 'मैं यह हूँ' ; — इति — इस प्रकार ; — अखण्ड विमर्श से बृंहित (पुष्ट)

समस्त प्राणियों का अपना आत्मा ही एकमात्र महेश्वर है, जिसका रूप विश्व है, जो 'मैं यह हूँ' इस अखण्ड विमर्श से बृंहित (पुष्ट) है।