Verses on the Recognition of the Lord· 15.6 / 18

Verses on the Recognition of the Lord15.6

15.6
सत्तानन्दः क्रिया पत्युस् तदभावो ऽपि सा पशोह् द्वयात्मा तद् रजो दुःखं श्लेषि सत्त्वतमोमयम् ॥६॥
sattānandaḥ kriyā patyus tadabhāvo 'pi sā paśoh dvayātmā tad rajo duḥkhaṃ śleṣi sattvatamomayam
— सत्ता का आनन्द (सत्त्व, आनन्द-रूप) ; — क्रिया ; — पति (ईश्वर) की ; — उस (आनन्द) का अभाव (अनानन्द) ; — भी ; — वही (क्रिया) ; — पशु (बद्ध जीव) की ; — द्वि-स्वरूप (सुख-दुःख रूप) ; — वह ; — रजस् ; — दुःख-रूप ; — श्लेषकारी, (दोनों को) जोड़ने वाला ; — सत्त्व और तमस्-मय (को बाँधने वाला)

सत्ता का आनन्द पति (ईश्वर) की क्रिया है; उसका अभाव भी पशु के लिए वही (क्रिया), अब द्वि-स्वरूप (सुख-दुःख रूप) होकर, रजस् है — वह श्लेषकारी (जोड़ने वाला), दुःख-रूप (रजस्), जो सत्त्व और तमस् को (परस्पर बाँधता है)।