Verses on the Recognition of the Lord· 15.16 / 18

Verses on the Recognition of the Lord15.16

15.16
इति प्रकटितो मया सुघट एष मार्गो नवो महागुरुभिर् उच्यते स्म शिवदृष्टिशास्त्रे यथा तद् अत्र निदधत् पदं भुवनकर्तृताम् आत्मनो विभाव्य शिवतामयीम् अनिशम् आविशन् सिद्ध्यति ॥१६॥
iti prakaṭito mayā sughaṭa eṣa mārgo navo mahāgurubhir ucyate sma śivadṛṣṭiśāstre yathā tad atra nidadhat padaṃ bhuvanakartṛtām ātmano vibhāvya śivatāmayīm aniśam āviśan siddhyati
— इति — इस प्रकार ; — प्रकट किया गया, प्रकटित (भूत कृदन्त) ; — मेरे द्वारा ; — सुघट — सुस्थापित, सुसंगत ; — यह मार्ग ; — नया ; — महागुरुओं के द्वारा ; — कहा गया था (√वच् + स्म, भूत अर्थ में) ; — शिवदृष्टि शास्त्र (सोमानन्द के ग्रन्थ) में ; — जैसा कि ; — इसलिए ; — यहाँ, इस (मार्ग) में ; — रखता हुआ (√धा+नि, वर्तमान कृदन्त) ; — पद, चरण ; — भुवन-कर्तृता (जगत्-स्रष्टृत्व) को ; — आत्मा की ; — भलीभाँति जानकर, अनुभव करके (पूर्वकालिक क्रिया, प्रेरणार्थक √भू+वि) ; — शिवतामयी (शिव-स्वरूप को) ; — निरन्तर, अनवरत ; — प्रवेश करता हुआ (√विश्+आ, वर्तमान कृदन्त) ; — सिद्धि प्राप्त करता है (√सिध्)

इस प्रकार मेरे द्वारा यह सुघट (सुस्थापित) नया मार्ग प्रकट किया गया है, जैसा कि महागुरुओं द्वारा शिवदृष्टि शास्त्र में कहा गया था; इसलिए यहाँ (इस मार्ग में) पद रखकर, आत्मा की शिवतामयी (शिव-स्वरूप) भुवन-कर्तृता (जगत्-स्रष्टृत्व) को भलीभाँति जानकर, निरन्तर (उसमें) प्रवेश करता हुआ (साधक) सिद्धि प्राप्त करता है।