Verses on the Recognition of the Lord· 14.6 / 20

Verses on the Recognition of the Lord14.6

14.6
शुद्धबोधात्मकत्वे ऽपि येषां नोत्तमकर्तृता निर्मिताः स्वात्मनो भिन्ना भर्त्रा ते कर्तृतात्ययात् ॥६॥
śuddhabodhātmakatve 'pi yeṣāṃ nottamakartṛtā nirmitāḥ svātmano bhinnā bhartrā te kartṛtātyayāt
— (यद्यपि उनका) स्वरूप शुद्ध बोध है ; — भी ; — जिनमें ; — नहीं ; — उत्तम कर्तृता (सर्वोच्च कर्तृत्व) ; — निर्मित, रचे गए (भूत कृदन्त) ; — (अपने) आत्मा से ; — भिन्न रूप में (भूत कृदन्त) ; — भर्ता (ईश्वर) के द्वारा ; — वे ; — (पूर्ण) कर्तृता के व्यतिक्रम (अभाव) के कारण

जिनका स्वरूप यद्यपि शुद्ध बोध है, फिर भी जिनमें उत्तम कर्तृता नहीं है — वे, (पूर्ण) कर्तृता के व्यतिक्रम (अभाव) के कारण, भर्ता (ईश्वर) के द्वारा अपने आत्मा से भिन्न रूप में निर्मित किए जाते हैं।