Verses on the Recognition of the Lord· 14.5 / 20

Verses on the Recognition of the Lord14.5

14.5
भिन्नवेद्यप्रथात्रैव मायाख्यं जन्मभोगदम् कर्तर्य् अबोधे कार्मं तु मायाशक्त्यैव तत् त्रयम् ॥५॥
bhinnavedyaprathātraiva māyākhyaṃ janmabhogadam kartary abodhe kārmaṃ tu māyāśaktyaiva tat trayam
— भिन्न वेद्यों (विषयों) रूप में प्रथन (फैलाव) ; — यहाँ (इस सन्दर्भ में) ; — मायीय (मल) कहलाने वाला ; — जन्म और भोग देने वाला ; — कर्ता में ; — अबोध (अज्ञ कर्ता में) ; — कार्म (मल) ; — किन्तु ; — माया-शक्ति से ही ; — वह त्रय (तीन मल)

भिन्न वेद्यों (विषयों) रूप में प्रथन (फैलाव), जो यहाँ मायीय (मल) कहलाता है, जन्म और भोग देने वाला है; और अबोध कर्ता में जो (मल) है वह कार्म (मल) है; वह त्रय (तीन मल) माया-शक्ति से ही (विद्यमान है)।