svātantryahānir bodhasya svātantryasyāpy abodhatā
dvidhāṇavaṃ malam idaṃ svasvarūpāpahānitaḥ
— स्वातन्त्र्य की हानि; — बोध (चैतन्य) की; — स्वातन्त्र्य की; — भी, और; — अबोधता — चैतन्य का अभाव (जड़ता); — द्विविध, दो प्रकार का; — आणव (व्यष्टि आत्मा से सम्बद्ध); — मल — मलिनता; — यह; — अपने ही स्वरूप के अपहान (विस्मरण) से
बोध (चैतन्य) के स्वातन्त्र्य की हानि, तथा स्वातन्त्र्य का भी अबोधता (जड़ता) हो जाना — यह द्विविध आणव मल है, जो अपने ही स्वरूप के अपहान (विस्मरण) से उत्पन्न होता है।