Verses on the Recognition of the Lord· 14.4 / 20

Verses on the Recognition of the Lord14.4

14.4
स्वातन्त्र्यहानिर् बोधस्य स्वातन्त्र्यस्याप्य् अबोधता द्विधाणवं मलम् इदं स्वस्वरूपापहानितः ॥४॥
svātantryahānir bodhasya svātantryasyāpy abodhatā dvidhāṇavaṃ malam idaṃ svasvarūpāpahānitaḥ
— स्वातन्त्र्य की हानि ; — बोध (चैतन्य) की ; — स्वातन्त्र्य की ; — भी, और ; — अबोधता — चैतन्य का अभाव (जड़ता) ; — द्विविध, दो प्रकार का ; — आणव (व्यष्टि आत्मा से सम्बद्ध) ; — मल — मलिनता ; — यह ; — अपने ही स्वरूप के अपहान (विस्मरण) से

बोध (चैतन्य) के स्वातन्त्र्य की हानि, तथा स्वातन्त्र्य का भी अबोधता (जड़ता) हो जाना — यह द्विविध आणव मल है, जो अपने ही स्वरूप के अपहान (विस्मरण) से उत्पन्न होता है।