Verses on the Recognition of the Lord· 14.3 / 20

Verses on the Recognition of the Lord14.3

14.3
स्वाङ्गरूपेषु भावेषु प्रमाता कथ्यते पतिः मायातो भेदिषु क्लेशकर्मादिकलुषः पशुः ॥३॥
svāṅgarūpeṣu bhāveṣu pramātā kathyate patiḥ māyāto bhediṣu kleśakarmādikaluṣaḥ paśuḥ
— अपने अंगों (अवयवों) के रूप में (प्रतीत होते भावों में) ; — भावों के (होने पर) ; — प्रमाता ; — कहलाता है (कर्मवाच्य, √कथ्) ; — पति — स्वामी, ईश्वर ; — माया से ; — भिन्न (भावों के होने पर) ; — क्लेश, कर्म आदि से कलुषित ; — पशु — बद्ध जीव

जब भाव उसके अपने अंगों (अवयवों) के रूप में (प्रतीत होते हैं), तब प्रमाता 'पति' कहलाता है; और जब माया से वे भिन्न (रूप में प्रतीत होते हैं), तब क्लेश, कर्म आदि से कलुषित होकर वह 'पशु' (बद्ध जीव) है।